Thursday, 30 October 2014

 जिंदगी पल-पल ढलती है, 
जैसे रेत मुट्टी से फिसलती है .....
शिकवें कितने भी हो हर पल, 
फिर भी हंसते रेहना.....
कियंकी ये जिंदगी जैसा भी है ,
बस एक बार मिलती है . 

हम और हमरे ईश्वर ,
दोनों एक जैसे है ,
वो हमारी गलतियों को ,
हम उसकी मेहरबानियों को .


गलथियों से जुदा 
तू भी नहीं 
मै भी नहीं ,

दोनो इंसान है,
खुदा थू भी नहीं,
मै भी नहीं......

थू मुझे , और मै तुझे,
इल्जाम देते है मगर ,
अपने अंदर झंक्ता 
तु भी नहीं ,
मै भी नहीं.......!!!

गलथ फ़ेमियों ने कर ढी
दोनों में पैदा दूरियान ,
वर्ना फितरत का बुरा 
तू भी नहीं,
मै भी नहीं......!!!

एक पत्तर सिर्फ एक बार मन्दिर जता है ,
और भगवान बन जाता है ---
इंसान हर रोज मन्दिर जाता है ,
फिर भी पत्थर ही रेहते है... !! 
(Think it is Kabir's doha)

1 comment:

  1. आपकी लाइनें पढ़ कर अच्छा लगा। साथ ही यह जानकर ख़ुशी हुइ की आप pnb में थे। मैं मुज़फ़्फ़र नगर ब्रांच से जून ११ में चीफ़ रिटायर हुआ।
    दो बार विपासना कैम्प कर चुका हूँ। इसलिए आपकी बात समझ पा रहा हूँ। धन्यवाद !

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